भूगोल | राजस्थान की जलवायु | मानसून | प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी
उत्तर भारत में हिमालय जब भी मानसूनी हवाओं के रास्ते में आता है, तो उनसे सीधी टक्कर लेकर भारी बारिश करवा देता है। लेकिन राजस्थान में भी तो एक पर्वत श्रृंखला मौजूद है — अरावली। फिर भी राजस्थान का बड़ा हिस्सा हर साल सूखे जैसी स्थिति झेलता है। सवाल उठता है कि जब मानसूनी हवाएं दोनों तरफ (अरब सागर और बंगाल की खाड़ी) से राजस्थान के पास से गुज़रती हैं, तो अरावली उन्हें बारिश में क्यों नहीं बदल पाती? आइए इसे शुरू से, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।
पहले मौसम और जलवायु का फर्क समझ लें
अक्सर मौसम (weather) और जलवायु (climate) को हम एक ही समझ बैठते हैं, जबकि दोनों में बुनियादी अंतर है। मौसम बदलता रहता है — आज धूप है तो कल बारिश हो सकती है, परसों उमस भरा दिन हो सकता है। यह किसी जगह की अल्पकालिक (short-term) वायुमंडलीय स्थिति है — तापमान, वर्षा, हवा का दिन-प्रतिदिन बदलता रूप।
जलवायु इसके उलट है। यह किसी स्थान की दीर्घकालिक (long-term) औसत स्थिति है — आमतौर पर 30 से 35 साल के आंकड़ों का औसत निकालकर तय की जाती है कि उस जगह पर सामान्यतः कैसा मौसम रहता है। यानी मौसम रोज़ बदलने वाला "मन" है, तो जलवायु एक जगह की स्थायी "पर्सनालिटी"।
मानसून बनता कैसे है?
"मानसून" शब्द अरबी भाषा के "मौसिन" से आया है, जिसका अर्थ है — हवाओं की दिशा का उलटना (reversal of winds)। यह प्रक्रिया शुरू होती है पृथ्वी के अक्षीय झुकाव (axial tilt) से, जो लगभग 23.5 डिग्री है। इसी झुकाव की वजह से गर्मियों में सूर्य की किरणें भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के समुद्रों — अरब सागर व बंगाल की खाड़ी — पर लगभग सीधी पड़ती हैं। इससे समुद्र का पानी तेज़ी से वाष्पित (evaporate) होता है।
यह नम हवा सीधे ऊपर नहीं उठती, बल्कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने की वजह से उत्पन्न कोरिओलिस बल (Coriolis force) इसे एक दिशा में मोड़ देता है। यही मुड़ी हुई, नमी से भरी हवा भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ती है — और यही है दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon), जो गर्मियों में समुद्र से ज़मीन की ओर बहता है और भारत में जून से सितंबर तक ज़्यादातर बारिश इसी से होती है।
मानसून की दो शाखाएं और राजस्थान तक उनका सफर
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में दाखिल होते ही दो शाखाओं में बंट जाता है:
- अरब सागर शाखा: यह ज़्यादा ताकतवर मानी जाती है। यह केरल तट से टकराती है और पश्चिमी घाट (सह्याद्री) से लगभग समकोण (perpendicular) पर सीधी टक्कर लेती है, जिससे केरल-कोंकण क्षेत्र में भारी बारिश होती है। इसके बाद यह मुंबई, कोंकण, गुजरात होते हुए कच्छ की खाड़ी तक पहुंचती है।
- बंगाल की खाड़ी शाखा: यह म्यांमार और पूर्वोत्तर भारत (मेघालय, चेरापूंजी क्षेत्र) की ओर उठती है, जहां हिमालय से टकराकर दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में से एक बनाती है। इसके बाद यह पश्चिम की ओर मुड़कर गंगा के मैदानी इलाकों से होते हुए पंजाब-दिल्ली तक पहुंचती है।
यहीं से राजस्थान की कहानी शुरू होती है। मानसून का प्रवेश देश में आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल तट से होता है, और फिर यह उत्तर की ओर बढ़ते हुए जून के अंत तक दिल्ली-हरियाणा-पंजाब और जुलाई के मध्य तक राजस्थान पहुंचता है — लेकिन तब तक यह अपनी ताकत का बड़ा हिस्सा गंवा चुका होता है।
तो अरावली बारिश क्यों नहीं करवा पाती?
यहां समझने वाली मुख्य बात यह है कि पहाड़ बारिश तभी करवाते हैं जब नम हवाएं उनसे सीधी टकराकर ऊपर उठने को मजबूर हों — इससे हवा ठंडी होती है, संघनन (condensation) होता है, और बारिश बरसती है। हिमालय के साथ ठीक यही होता है। लेकिन अरावली के साथ मामला अलग है, और इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं:
- दिशा (Orientation): अरावली की श्रृंखला लगभग दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में फैली है — यानी यह मानसूनी हवाओं के लगभग समानांतर (parallel) पड़ती है, आड़े-तिरछे (perpendicular) नहीं। नतीजा यह है कि अरब सागर से आने वाली हवाएं अरावली से सीधी टकराने की बजाय उसके किनारे-किनारे होकर आगे निकल जाती हैं — ठीक वैसे ही जैसे कोई गाड़ी किसी दीवार से टकराने की बजाय उसके बगल से गुज़र जाए।
- ऊंचाई (Height): अरावली दुनिया की सबसे पुरानी वलित (fold) पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है — करोड़ों वर्षों के अपरदन (erosion) ने इसे काफी घिसकर छोटा कर दिया है। इसकी सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर (माउंट आबू, सिरोही) की ऊंचाई भी मात्र 1,722 मीटर है। इतनी कम ऊंचाई के चलते बहुत-सी नमी वाली हवाएं इसके ऊपर से ही निकल जाती हैं, बिना टकराए।
यानी नमी हवाओं में मौजूद तो होती है, लेकिन अरावली न तो सही दिशा में खड़ी है और न ही इतनी ऊंची कि उसे बारिश में बदलने के लिए मजबूर कर सके।
पूर्वी राजस्थान बनाम पश्चिमी राजस्थान
अरावली राजस्थान को असल में दो हिस्सों में बांटती है — और यह बंटवारा बारिश के पैटर्न में साफ दिखता है। पूर्वी राजस्थान (अरावली के पूर्व का हिस्सा) में अपेक्षाकृत उपजाऊ मैदान मिलते हैं, जहां थोड़ी-बहुत मानसूनी बारिश पहुंच जाती है। वहीं पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर जैसे क्षेत्र) अरावली के पश्चिम में पड़ता है, जहां मानसून का असर लगभग नहीं के बराबर रहता है और थार मरुस्थल फैला है।
दिलचस्प बात यह है कि राजस्थान में जो भी हल्की-फुल्की बारिश होती है, वह अक्सर तब होती है जब अरब सागर और बंगाल की खाड़ी — दोनों शाखाएं पंजाब-दिल्ली क्षेत्र में आकर आपस में मिलती हैं और वहां से एक कमज़ोर, थका हुआ प्रवाह पलटकर राजस्थान की ओर आता है। यही वजह है कि राज्य में एकमात्र प्रमुख हिल स्टेशन माउंट आबू तुलनात्मक रूप से ज़्यादा बारिश (लगभग 80-150 सेमी) पाता है, क्योंकि वहां ऊंचाई की वजह से कुछ हद तक हवाएं टकराती हैं।
सर्दियों की बूंदाबांदी — मावट किससे होती है?
एक आम भ्रम यह भी है कि राजस्थान में सर्दियों में जो हल्की बारिश होती है (जिसे स्थानीय भाषा में मावट कहा जाता है), वह लौटते हुए उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon) से होती है। असल में उत्तर-पूर्वी मानसून व्यावहारिक रूप से राजस्थान तक पहुंचता ही नहीं — यह मुख्यतः तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों तक सीमित रहता है। राजस्थान की मावट दरअसल पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) से होती है, जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उठने वाला एक अलग मौसमी तंत्र है।
अरावली के बारे में कुछ ज़रूरी तथ्य
- अरावली, संस्कृत के "अर" और "वलि" से बना शब्द है, जिसका अर्थ है — "पर्वत शिखरों की रेखा"।
- यह मूल रूप से एक वलित (fold) पर्वत श्रृंखला के रूप में बनी थी, लेकिन करोड़ों वर्षों के अपरदन के बाद अब यह एक अवशिष्ट पर्वत (residual mountain) का रूप ले चुकी है।
- यह दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है — इसकी उत्पत्ति प्रीकैम्ब्रियन/प्रोटेरोज़ोइक युग में हुई मानी जाती है।
- यह दिल्ली के पास से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान से होते हुए गुजरात के अहमदाबाद तक लगभग 670 किलोमीटर फैली है।
- सबसे ऊंची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू, सिरोही) — ऊंचाई 1,722 मीटर।
निष्कर्ष
तो कुल मिलाकर, अरावली मानसून को इसलिए नहीं रोक पाती क्योंकि वह न तो हवाओं की दिशा के आड़े खड़ी है, न ही उतनी ऊंची कि उन्हें ऊपर उठने पर मजबूर कर सके। नतीजा यह होता है कि नमी से भरी मानसूनी हवाएं राजस्थान के बगल से होकर गुज़र जाती हैं, और राज्य को सिर्फ दोनों शाखाओं के मिलन से बचा-खुचा, कमज़ोर मानसून ही नसीब होता है। यही वजह है कि पश्चिमी राजस्थान में थार जैसा विशाल मरुस्थल बन पाया, जबकि पूर्वी राजस्थान अपेक्षाकृत हरा-भरा रह गया।
🧠 अभ्यास प्रश्न (Practice Question)
राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान/क्षेत्र कौन सा है?
(a) जैसलमेर (b) झालावाड़ (c) माउंट आबू (सिरोही) (d) बीकानेर
कमेंट में अपना उत्तर ज़रूर बताएं!

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