ब्रिक्स (BRICS) क्या है? भारत के लिए इसका महत्व और 2026 दिल्ली शिखर सम्मेलन
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दुनिया में ऐसे 10 देश हैं जो मिलकर पूरी दुनिया की लगभग आधी आबादी, दुनिया की जीडीपी का करीब 40% हिस्सा और वैश्विक व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा रिप्रेजेंट करते हैं। इन्हीं देशों का एक अनौपचारिक समूह है — ब्रिक्स (BRICS)। दिलचस्प बात यह है कि इस समूह का कोई स्थायी मुख्यालय नहीं है, कोई संधि (treaty) नहीं हुई है, फिर भी यह हर साल शिखर सम्मेलन (summit) आयोजित करता है और वैश्विक मंचों पर एक मजबूत आवाज़ बनकर उभरा है। इसी वजह से इसकी तुलना अक्सर G7 जैसे शक्तिशाली समूहों से की जाती है।
ब्रिक्स का इतिहास: BRIC से BRICS तक
ब्रिक्स की शुरुआत एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। लगभग 25 साल पहले गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने अपने एक शोध पत्र में यह विचार रखा कि आने वाले वर्षों में चार अर्थव्यवस्थाएँ — ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन — तेज़ी से उभरेंगी। इन्हीं देशों के पहले अक्षरों से बना शब्द "BRIC" लोकप्रिय हो गया। इन चारों देशों ने इस विचार को अपनाया और 2009 में रूस में पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया।
2011 में दक्षिण अफ्रीका इस समूह में शामिल हुआ और नाम बदलकर BRICS हो गया। 2014-15 में इन देशों ने अपना खुद का विकास बैंक — न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) — स्थापित किया, जो आज भारत जैसे सदस्य देशों के लिए बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में वित्तीय सहायता का बड़ा स्रोत बन चुका है।
2023-2025 के बीच मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इंडोनेशिया भी इस समूह से जुड़ गए, जिससे सदस्य संख्या 10 हो गई। सऊदी अरब को भी सदस्य के रूप में आमंत्रित किया गया, लेकिन उसने अब तक औपचारिक रूप से सदस्यता स्वीकार नहीं की है — इसीलिए कई जगह ब्रिक्स की आधिकारिक वेबसाइट पर सदस्य संख्या 11 और वास्तविक स्वीकृति के आधार पर 10 बताई जाती है।
सर्वसम्मति: ब्रिक्स के काम करने का तरीका
ब्रिक्स की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई भी फैसला बहुमत (majority voting) के आधार पर नहीं लिया जाता। किसी भी विषय पर तभी सहमति बनती है जब सभी सदस्य देश उस पर सहमत हों — इसे सर्वसम्मति (consensus) कहा जाता है। यही सर्वसम्मति इस अनौपचारिक समूह को इतने वर्षों तक जीवित और प्रासंगिक बनाए रखने की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है।
ब्रिक्स सहयोग के मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिका है:
- राजनीतिक व सुरक्षा सहयोग — विदेश मंत्रियों और सुरक्षा सलाहकारों की नियमित बैठकें, तथा UN, G20, WTO, IMF जैसे मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन।
- आर्थिक व वित्तीय सहयोग — वित्त मंत्रियों की बैठकें, न्यू डेवलपमेंट बैंक और आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement - CRA) जैसी संस्थाएँ, जो विदेशी मुद्रा संकट में सदस्य देशों की मदद करती हैं।
- सांस्कृतिक व जन-सहयोग — बिजनेस काउंसिल, थिंक-टैंक काउंसिल और सिविल सोसाइटी फोरम के माध्यम से आपसी अनुभव व ज्ञान का आदान-प्रदान।
भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व
भारत ब्रिक्स का एक संस्थापक सदस्य है और अब तक चार बार इसकी अध्यक्षता कर चुका है (2012, 2016, 2021 और 2026)। भारत के लिए इस समूह का महत्व कई स्तरों पर देखा जा सकता है:
- बिना गुटबंदी वाली वैश्विक आवाज़: भारत क्वाड (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ) का भी हिस्सा है और ब्रिक्स (चीन, रूस के साथ) का भी। इससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) और बहु-दिशा जुड़ाव (multi-alignment) की नीति मजबूत होती है — भारत किसी एक खेमे तक सीमित नहीं रहता।
- वित्तीय सहयोग: न्यू डेवलपमेंट बैंक के कुल पोर्टफोलियो में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है, और भारत को मेट्रो परियोजनाओं व रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम जैसी अनेक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए इस बैंक से बड़ी वित्तीय सहायता मिली है।
- व्यापार, ऊर्जा व डिजिटल सहयोग: ब्रिक्स के सदस्य देशों से ऊर्जा व खनिज आपूर्ति (जैसे रूस व यूएई से गैस, इंडोनेशिया से कोयला) मजबूत हुई है। साथ ही भारत का UPI भुगतान मॉडल कई ब्रिक्स देशों के लिए एक उदाहरण बन रहा है, और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाकर डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रयास चल रहे हैं।
- वैश्विक शासन सुधार की मांग: ब्रिक्स देश मिलकर UN सुरक्षा परिषद, IMF और विश्व बैंक में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाते हैं, जिससे भारत की आवाज़ को अतिरिक्त समर्थन मिलता है।
ब्रिक्स के सामने चुनौतियाँ
इतने बड़े और विविधतापूर्ण समूह के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं। सर्वसम्मति से फैसला लेने का नियम कई बार आम राय बनाना मुश्किल बना देता है, क्योंकि सदस्य देशों के आपसी हित और नज़रिए अलग-अलग हैं — जैसे ईरान और यूएई के बीच क्षेत्रीय तनाव, या मिस्र-इथियोपिया के बीच प्रतिद्वंदिता। रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर भी सदस्यों के बीच गहरे मतभेद देखे जाते हैं। इसके अलावा, चीन और रूस जहाँ ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के विरोधी मंच के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, वहीं भारत और ब्राज़ील जैसे देश इससे असहमत हैं और इसे संतुलनकारी मंच के रूप में देखना पसंद करते हैं।
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026, नई दिल्ली
भारत ने 1 जनवरी 2026 को अपनी चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता (Chairship) संभाली और 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम (प्रगति मैदान) में आयोजित हुआ। इस बार की थीम है — "Building Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability" (समुत्थानशीलता, नवाचार, सहयोग और संधारणीयता का निर्माण), जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "ह्यूमैनिटी फर्स्ट" (Humanity First) दृष्टिकोण से प्रेरित है। यह वर्ष ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक है।
निष्कर्ष
ब्रिक्स एक आर्थिक अवधारणा के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन आज यह दुनिया की एक-चौथाई अर्थव्यवस्था और आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला एक प्रभावशाली वैश्विक मंच बन चुका है। भारत के लिए यह मंच रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने, वित्तीय सहयोग हासिल करने और वैश्विक शासन-सुधार की मांग को मज़बूती से रखने का महत्वपूर्ण जरिया है। 2026 का दिल्ली शिखर सम्मेलन भारत के लिए इसी संतुलन को और मज़बूत करने का एक बड़ा अवसर है।
🧠 अभ्यास प्रश्न (Practice Question)
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. "ब्रिक्स" शब्द सबसे पहले भारत सरकार ने वर्ष 2001 में गढ़ा था।
2. न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय शंघाई, चीन में स्थित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1 और न ही 2
कमेंट में अपना उत्तर ज़रूर बताएं!

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